Sunday, 2 August 2026

zindagi

Yeh jo zindagi ke hai marhale 

मत्ला (पहला शेर):

यह जो ज़िंदगी के हैं मरहले, यह हयात-ओ-मौत के सिलसिले कहीं चाहतों के मुक़ाम हैं, कहीं रंज-ओ-ग़म के हैं कारवाँ कहीं दिल मिले, कहीं दिल जले — यह जो ज़िंदगी के हैं मरहले

शेर २:

कहीं याद आती है रफ़्तगाँ, कहीं फ़िक्र-ए-फ़र्दा का आसमाँ कहीं रात गुज़रे अज़ाब में, कहीं राह में ही दिये जले कहीं ख़्वाब टूटे, कहीं दिल मिले — यह जो ज़िंदगी के हैं मरहले

शेर ३:

किसी राहगीर को सब मिला, किसी दश्त में ही मकाँ मिला कहीं हर घड़ी है बेकली, कहीं जा के दिल को सुकून मिले कहीं अश्क ढले, कहीं गुल खिले — यह जो ज़िंदगी के हैं मरहले

मक्ता (आख़री शेर):

'रमेश' तेरे अंदाज़-ए-बयाँ पे, रक़ीबों को भी नाज़ है छोड़ो शिकवे-गिले, आओ गले लग जाओ — यह जो ज़िंदगी के हैं मरहले


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